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indian farming

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Monday, 13 June 2016

Mushroom farming..

Mushroom ki Kheti Aur Business Kaise Kare (हिंदी) मशरुम का बिज़नेस (Mushroom business) एक ऐसा व्यापार है जो की कम पूंजी, कम जगह और कम समय में अच्छा return दे सकता है | Mushroom ki kheti kaise kare कोई rocket science नहीं है | आप थोड़ी सी मेहनत और लगन से mushroom ke business को उचाई तक ले जा सकते हैं | मैंने खुद मशरुम की बिज़नेस किया था परन्तु अच्छा business partner नहीं मिलने के कारण मुझे बिच में ही छोड़ना पड़ा | लेकिन मैं अपने अनुभव से बतला सकता हूँ की mushroom एक profitable business है जो कम समय में अच्छा return दे सकता है | और हाँ अगर आप ghar baithe किसी business के बारे में सोच रहे है, तो mushroom बिज़नेस आपके लिए है | चलिए mushroom ke kheti ki adhik se adhik jankri हासिल करे ise kaise karte hai और व्यापार कैसे किया जाये | तो चलिए जानते है की कैसे मशरुम व्यापार की सुरुवात किया जाये और किन किन चीजों की जरुरत होगी | Space Requirement मशरुम की खेती करने से पहले आपको यह तय करना होगा की आप कितना उत्पादन करना चाहते है और उसी की अनुसार space की जरुरत होगी | एक medium मशरुम के पैकेट से आप लगभग 1 से 4 kg तक आसानी से उत्पादन कर सकते हैं | अगर आप केवल सुरुवात कर के देखना चाहते है की मशरुम का बिज़नेस कर पाएंगे या नहीं तो उसके लिए 300 Sq feet की जगह लगेगी | और हाँ ध्यान रखे की जिस place पर आप mushroom business setup करने जा रहे है वो market से ज्यादा दूर नहीं हो | आप चाहे तो घर की पीछे भी इसे start कर सकते है, परन्तु जगह पूरा बंद होना चाहिये | Things Required इसकी खेती के लिए आपको मशरुम को उगाना पड़ेगा और इसे 3 तरह से किया जा सकता है : 1. Bed बना कर 2. लटका (hang) कर 3. जमीन से थोड़ी उचाई पर रख कर Bed बना कर अगर आप सुरुवात कर रहे है तो कोशिश करें की कम से कम investment में mushroom का business start करें | इसके लिए आप चाहे तो बांस (bamboo) से बेड-नुमा आकार के bed तैयार कर सकते है जिसके ऊपर मशरुम को रखा जा सकता है | यह तरीका काफी सस्ता और affordable भी है | लटका (hang) कर इस विधि में मशरुम के packet को लटका (hang) कर के रखा जाता है | इस तरीके से आप कम से कम place में ज्यादा से ज्यादा mushroom उगा सकते हैं | इसे समझाने के लिए मैंने यह picture यहाँ share की है ताकि आपको अच्छे से idea मालूम चल सके | जमीन से थोड़ी उचाई पर रख कर इस विधि में मशरुम के पैकेट या बीज को को बिना किसी सहारे के सीधे जमीन पर रख कर उगाया जाता है | Types of Mushroom India में मुख्यतः 2 तरह के mushroom उपयोग में लाये जाते है: 1. Oyster Mushrooms 2. Button Mushroom आप decide कर लें की आपको किस मशरूम की खेती करनी है, दोनों के अलग अलग फायदे, demand और price (दाम) हैं market में | वैसे button mushroom. Mushroom Spawn इसे mushroom ka bij (बीज) भी बोलते है | इसी बीज से मशरुम उगाया जाता है | वैसे तो आप spawn को उगा भी सकते है परन्तु अच्छा यही रहेगा की आप किसी नजदीक केंद्र से spawn खरीद लें, जब आपका mushroom ka business बढेगा तब आप spawn बनाने की सोच सकते हैं | Plastic Bags आपको प्लास्टिक बैग की भी जरुरत होगी ताकि मशरूम के पैकेट बना कर बंधा जा सके | ध्यान रहे को यह विधि केवल Oyster Mushrooms के लिए है | अगर आप बटन मशरुम की खेती करना चाहते है तो उसके लिए आपको दूसरी तरीके से खेती करनी होगी | Plastic bag साधारण bag से मोटी और मजबूत होगी | आप इसे नजदीकी market से खरीद सकते है | दुकान वाले से बोले की mushroom पैकेट बांधने के लिए मोटी प्लास्टिक दे जो की 5 से 8 kg तक का वजन सह सके | भूसा या पुआल (Straw) अब अगला काम है की आप पुआल की इंतेजाम करे | इसके लिए आप नजदीकी ग्वाले (दूध वाले ) से संपर्क कर के मालूम कर सकते है की कहाँ पर पुआल मिलेगा | सुरुवाती तौर पर आप 5 से 6 बोड़ा भूसा ले कर रख सकते है | शुरुवात के लिए इतनी मात्रा enough होगी | ध्यान रहे की पुआल ज्यादा बड़ी नहीं होने चाहिये और ना ही बिलकुल छोटी | 1/2 इंच का पुआल ठीक रहेगा | एक बड़े बाल्टी या टब में जरुरत के हिसाब से भूसा को दाल कर उसमें अच्छी मात्र में पानी दाल कर रात भर छोड़ दें | इसमें एक liquid भी मिलाना पड़ता है (आप किसी mushroom किसान से इसके बारे में पूछताछ कर सकते हैं) | रात भर छोड़ने के बाद इसे टब से निकाल कर पानी गिरने दे और धुप में 2 से 4 घंटे के लिए छोड़ दें | ध्यान रहे की पुआल ना ही बिलकुल गिला और ना ही बिलकुल सुखा होना चाहिये | अब इसे उठा कर अन्दर ले जाये जहाँ पर इसे पैकेट में बांधा जायेगा, बड़े से प्लास्टिक के ऊपर रख कर फैला दें और 2 से 3 घंटे के लिए fan on कर के छोड़ दे ताकि अतिरिक्त नमी निकाल जाये | ध्यान रहे की पुआल को साफ़ जगह पर ही रखे | अगर आपको मालूम करना है की पुआल ready हो गया है या नहीं तो सबसे अच्छा तरीका मालूम करने का यह है की पुआल को मुट्ठी में दबा कर देखे की पानी गिरता है या नहीं | अगर मुट्ठी में पुआल को जोर से दबाने से पानी नहीं गिरता है तो समझे की पुआल ready है mushroom packet बांधने के लिए | Mushroom Packet बांधे अब आप प्लास्टिक को निचे से रस्सी (plastic rope) से बांध दें (अगर निचे से प्लाटिक कटी हुई हो तो) | अब इसमें 1/2 inch तक पुआल फैला कर भरे और इसके ऊपर किनारे किनारे mushroom spawn को थोडा थोडा कर के दाल दें | 20 से 25 mushroom spawn के दाने को बिच में भी फैला कर दाल दें | अब इसके ऊपर फिर से 1/2 इंच तक पुआल डाले और फिर से mushroom spawn को किनारे दाल दें | इस प्रक्रिया को तब 6 से 8 बार दोहराये ताकि 6 से 8 layer बन सके | ध्यान रहे की पुआल को भरने समय, इसे हल्का हल्का दबाते जाये | अब ऊपर से भी थोड़ी मात्र में मशरुम स्पान दाल कर इसे अच्छे से ऊपर से बांध दें | अब इसे साफ़ छोटी चीज (लकड़ी या पिन) से प्लास्टिक में जगह जगह hole कर देइउन ताकि इसमें से मशरुम बाहर निकाल पाये | आपका mushroom pack ready है | अब इसे तैयार stand में रस्सी के सहारे टांग दे जैसे निचे दिखाया गया है Notes निचे दिए गये कुछ महत्वपूर्ण mushroom ki kheti की jankari और tips दिए गए हैं जिसे आप अपनाकर mushroom business project को काफी अच्छी तरह से आगे ले जा सकते हैं | Mushroom packet को हमेशा dark और अँधेरे जगह रखे | धुप बिलकुल नहीं आनी चाहिए | खिड़कियाँ (windows) को हमेशा भींगे हुए बोदे से ढक कर रखे ताकि room में Moisture बना रहे | Room में जाने से पहले अपने चप्पल या जूते खोल कर जाये | अपने हाथ और पैर को साबुन (liquid soap) से अच्छी तरह धो कर ही room में जायें | समय समय पर (1 से 2 दिन में) हल्की हल्की पानी से mushroom के पैकेट के ऊपर बौछार किया करे, ताकि नमी बरकरार रहे | मशरुम उगाने में लगने वाला समय देखा जाये तो mushroom ko ugane mein लगभग 1 से 2 week लगता है और यह 4 से 6 week तक उत्पादन देता है | परन्तु 3 से 4 week के बाद production धीरे धीरे कम होने लगता है | Market फिलहाल Oyster Mushrooms का market दाम (rate) लगभग Rs 100 से 120 तक है | आप आसानी से Rs 60 से 80 तक रिटेलर (retailer) को बेच (sale\) कर सकते हैं | ठीक उसी तरह Button Mushroom का market rate लगभग Rs 180 से ले कर Rs 250 तक है | इसे बेचने के लिए आप सब्जी बेचने वाले से बात कर की उनको sale कर सकते है या फिर directly customers तो market rate से थोडा कम दाम से sale कर सकते है और अच्छा मुनाफा कम सकते हैं | Mushroom को किसी अच्छे transparent plastic bag में बंद (सील) कर के भी आप अच्छा rate ले सकते हैं |

Garlic(lahsun) farming.

Lahsun ki Vaigyanik Kheti – लहसुन की खेती Yakin maniye Lahsun ki uchit kheti kar ke aap lakho mein kama sakte hain. Jahan tak kaise kare ka sawal hai, apke pass kewal acchi jankari aur Vaigyanik tarike ko apnakar start kiya jaa sakta hai. लहसुन की खेती को अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए गए तरीके से की जाये तो किसानो को बहुत कम खर्च में अच्छा benefits हो सकता है । अगर भूमि और फसल की अच्छे से देखभाल की जाये तो किसानो को प्रति hectare 100 से 200 क्विंटल उपज मिल जाती है। वैज्ञानिको द्वारा लहसुन की खेती के लिए कैसी भूमि होनी चाहिए, खेत में कब और कितना खाद देना चाहिए, कब कब सिंचाई करनी चाहिए आदि की जानकारी हम आपको निचे बताएँगे । Lahsun ki Kheti Kaise Kare Agar aapke pass badi se jamin hai aur sahi tarike se Garlic ki kheti ki jaye to aap lakhon mein aasani se 3 months mein kama sakte hai. Iske liye aapko Vaigyanik tarike ko apnakar lahsun ki uchit kheti karni hogi aur hard work ke saath aap isse accha business kar sakte hai. खेती के लिए भूमि का चयन/ Selection of Land लहसुन की खेती के लिए दोमट भूमि जिसमे जल निकलने की प्रबंध अच्छी हो उसे सबसे उत्तम माना जाता है । लहसुन की खेती शुरु करने से पूर्व भूमि की जुताई कर के उसे भुरभुरा बना कर उसपर पाटा चला देना चाहिए इससे भुरभुरी भूमि फिर से समतल हो जाती है । खेती के लिए जलवायु लहसुन की खेती के लिए ठंडी जलवायु की जरुरत पड़ती है क्योंकि ठंड में दिन छोटा होने के कारण कंद का उत्पादन अच्छे से होता है । लहसुन की खेती समुद्र के level से 1000-1400m तक कि ऊंचाई पर की जा सकती है। लहसुन की खेती के लिए लगभग 30 से 35 डिग्री से. तक का temperature और लगभग 10 घंटे का दिन को उत्तम माना जाता है । बीजोपचार / बीज बुवाई लहसुन की खेती में बीज बुवाई से पूर्व बीजों को Kerosene से उपचारित कर लेना चाहिए। बीज बोने के लिए भूमि को 4 से 5cm गहरा खोद लेना चाहिए। फसल की अच्छी उपज हेतु लहसुन को डबलिंग विधि से बोना चाहिए । बुवाई करने वक्त कतार से कतार की दुरी लगभग 15cm और पौधों से पौधों की दूरी लगभग 8cm होनी चाहिए । खाद प्रबंधन लहसुन के अधिक उत्पादन के लिए एक एकड़ के हिसाब से लगभग 25 ton सड़ी हुई गोबर की खाद को खेत में डाल दें। इसके अलावा 50kg भू-पावर, 40 kg माइक्रो फर्टीसिटी कम्पोस्ट , 10kg माइक्रो भू-पावर, 10kg सुपर गोल्ड कैल्सीफर्ट, 50 kg अरंडी की खली और 20kg माइक्रो नीम, को अच्छी तरह एक साथ mix कर के तैयार लें और फिर खेत में समान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर खेत तैयार करें उसके बाद बीज की बुवाई करे | . बीज बोने के लगभग 25 दिन बाद उसमे 1 kg सुपर गोल्ड मैनिशियम और 500 माइक्रो झाइम को 400ml पानी में घोल बनाकर पम्प द्वारा खेत में छिड़काव करें उसके बाद हर 15 से 20 दिन के interval में दूसरा और तीसरा छिड़काव करे । खरपतवार नियंत्रण लहसुन की खेती में खरपतवार को नष्ट करने हेतु इसकी निराई गुड़ाई जरुर से करें। पहली निराई गुड़ाई बीज बोने के लगभग 25 दिन बाद खुरपी से करें । फिर दूसरी निराई गुड़ाई लगभग 50 दिन के बाद करें। सिंचाई /जल प्रबंधन लहसुन की खेती में फसल की वृद्धि हेतु भूमि में नमी का होना जरुरी होता है इसलिए बीज बोने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए । उसके बाद हर 15 days के interval में खेत की सिंचाई करनी चाहिए । रोग / किट नियंत्रण लहसुन में लगने वाले रोग व किट इस प्रकार के होते है :- थ्रिप्स किट :– थ्रिप्स किट दिखने में छोटे छोटे व पीले(yellow) रंग के होते है जो की पत्तियों का रस चूस कर उसपर सफ़ेद रंग के धब्बा बना देते है । इस किट से बचाव के लिए नीम का काढ़ा बना कर माइक्रो झाइम के साथ mix कर के 250ml पानी में घोल कर पम्प से खेत में छिड़काव करें । बैंगनी धब्बा रोग :- इस रोग में पत्तो पर और तने पर छोटे छोटे गुलाबी(pink) रंग के धब्बे हो जाते है। इस रोग से बचाव के लिए नीम का काढ़ा बना कर माइक्रो झाइम के साथ mix कर के 250ml पानी में घोल कर पम्प से खेत में छिड़काव करें । स्टेमफिलियम ब्लाईट रोग :- नम weather में लगने वाला यह रोग फफूंदी के कारण होता है। इस रोग से बचाव के लिए नीम का काढ़ा बना कर माइक्रो झाइम के साथ mix कर के 250ml पानी में घोल कर पम्प से खेत में छिड़काव करें । फसल की खुदाई लहसुन का फसल 2 month में ready हो जाता है । जब लहसुन का फसल तैयार हो जाता है तो उसके पत्ते पीले हो कर नष्ट हो जाते है। फसल तैयार होने के बाद कंदों को पौध सहित खोद कर उखाड़ लेना चाहिए फिर उसका बण्डल बनाकर 3 से 4 दिन तक धुप में सुखाया जाना चाहिए

Onion (pyaj) farming

Pyaj ki Kheti Kaise Kare – प्याज की वैज्ञानिक खेती Aaj ki is daur mein kaise pyaj ki kheti kare ke log lakhon mein kama rahe hai. Janiye kya hai sahi kheti karne ke tarike, iske vaigyanik प्याज (onion) जिसे किसी भी सब्जी के साथ मिला दिया जाये तो उस सब्जी का स्वाद बढ़ जाता है। प्याज बहुत दिनों तक खराब नहीं होता है। बाज़ार में इसका भाव बहुत हीं बढ़िया मिलता है इसलिए प्याज की खेती करने से किसानो को बहुत फायदा मिल सकता है । तो आइये जानते है प्याज की खेती कैसे करने से हमें ज्यादा profit हो सकता है । प्याज की खेती कैसे करे / Payaj ki Vaigyanik Kheti Aaj ke is daur mein pyaj ki kheti ek aisa business hai jise kisan bhai uga kar lakhon mein kama sakte hain. Agar aap onion ki kehti karne ki soch rahe hai to niche diye gaye tips ko follow kar ke accha khasa kama sakte hain. Iske saath saath thodi se jagah mein aap anar phal ki kheti bhi kar sakte hain aur adhik labh kama sakte hain. To aiye jante hai kaise kare pyaj ki adhunik tarike se aur kamay dhre sare paise. जमीन/ भूमि की तैयारी प्याज की सफल खेती में 5.8 से 6.5 के बिच के पी.एच. मान वाले जीवांशयुक्त हल्की दोमट भूमि या बलूई दोमट भूमि को श्रेष्ठ माना जाता है। खेती करने से पहले भूमि की अच्छे से साफ़ सफाई कर के उसे भुरभुरा बना लेना चाहिए। जलवायु प्याज की खेती हर तरह की जलवायु में किया जा सकता है बस थोड़ी सी सावधानी से काम लिया जाये तो प्याज की अच्छी उत्पादन संभव है। इसकी खेती के लिए ना ज्यादा गर्मी ना ज्यादा ठंड का मौसम सबसे सर्वोतम होता है । इसलिए छत्तीसगढ़ को प्याज के उत्पादन के लिए अनुकुल माना जाता है । कृषि वैज्ञानिको द्वारा प्याज की खेती पर तापमान का गहरा प्रभाव पड़ता है । अच्छी वृद्धि के लिए 20 डिग्री से. से 27 डिग्री से. तक का तापमान प्याज में अच्छी बढ़त लाता है। फल पकने समय तापमान 30 डिग्री से. से 35 डिग्री से. तक मिल जाये तो और भी बेहतर होता है । प्याज की प्रजाती प्याज के 3 प्रकार प्रमुख है जो रंगों के आधार पर है :- लाल रंग के प्याज :- इस रंग के प्याज में उन्नत किस्म के प्याज की प्रजाती का नाम है जैसे उषा रेड, उषा माधवी ,पंजाब सिलेक्शन , अर्का निकेतन, ऐग्री फाउंड dark red, ऐग्री फाउंड light red आदि । पीले रंग के प्याज:- इस किस्म के नाम इस प्रकार हुआ करते है – early green, brown spanish आदि। सफ़ेद रंग के प्याज :- इसके नाम इस प्रकार के है – उषा white, उषा round, उषा flat, आदि । सिचाई / जल प्रबंधन खेती करने के दवरान जल प्रबंधन का खास ध्यान रखना चाहिए। रबी के प्याज के लिए समय समय पर 10 से 12 बार सिचाई की जरुरत होती है। गर्मी में एक सप्ताह के अंतराल में और ठंड के मौसम में 15 दिनों में सिचाई करनी चाहिए। रबी के फसल में जब पत्ते पीले होने लगे तो सिचाई 15 दिन के लिए रोक देनी चाहिए जिससे पीले पत्ते सुख जाए और फिर खुदाई करके निकाले जा सके। खाद प्रबंधन कृषि वैज्ञानिको के द्वारा प्याज की खेती के लिए 300 से 350 क्विंटल अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेकटेयर की दर से भूमि तैयारी के समय ही मिला देनी चाहिए। नत्रजन(nitrogen) 80 kg, फास्फोरस (phasphoras) 50 kg, और पोटाश(potash) 80 kg प्रति हेक्टेयर की आवश्कता पड़ती है। पोटाश और फास्फोरस की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के साथ या रोपाई से पहले भूमि में मिला देनी चाहिए। बाकि आधी बची हुई नत्रजन दो बार में पहला रोपाई के 30 दिनों के बाद और दूसरा 45 दिनों के बाद छिड़काव के साथ दे । खरपतवार की सफाई इसके फसल में खरपतवार को निकालना आवश्यक होता है अन्यथा उपज काफी प्रभावित होती है । इसको नियंत्रित करने के लिए रोपाई से पहले 2kg वासालीन प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में छिड़क कर मिला दे और फिर 45 दिनों के बाद एक जुताई कर के खरपतवार को नियंत्रित किया जाना चाहिए । चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए 2.5kg टेनोरान प्रति हेक्टेयर की दर से 800 लीटर पानी में मिलाकर रोपाई के 20 से 25 दिनों के बाद छिड़काव किया जाना चाहिए । किट पतंग / रोग नियंत्रण प्याज की फसल में पाए जाने वाले बैगनी धब्बा रोग सबसे प्रमुख रोग होते है। इस रोग में पत्तियों पर आरम्भ में पीले से सफ़ेद धसे हुए धब्बे लगते है जिनके बिच का भाग बैगनी रंग का होता है । यह रोग तेजी से बढ़ता है और पत्तियों से फैलकर बिच के स्तंभों में पहुँच जाता है । इस रोग के प्रभाव से प्याज का भंडारण करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि इस दरम्यान प्याज अधिक मात्रा में गलने लगता है । इस रोग के लगते हीं इसमें कोई फफूंदनाशक दवा जैसे copper oxychloride का वैज्ञानिक विधि इस्तेमाल करके इस रोग से बचा जा सकता है। इसके अलावा कुछ किट ऐसे भी होते है जो प्याज के पत्तो के बाहरी त्वचा को खरोच कर रस चूसते है जिससे पत्तियों पर असंख्य छोटे छोटे सफ़ेद धब्बे बन जाते है । समय रहते अगर किसान इसे नियंत्रित नहीं कर पाए तो प्याज में निरुपता आ जाती है साथ हीं लगभग 25% उपज कम हो जाती है । Jab payaj ki fasal tayyar ho jaye to mandi mein yaa phir sidhe khudra bajar mein jaa kar bech dein aur accha fayde kamaye.

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Potatoes farming

Aloo ki Vaigyanik Kheti – आलू की खेती Sabji ka raja Aloo ki uchit kheti kar ke aap lakhon mein aasani se kama sakte hain. Agar aap hardworking hain aur iski scientific jankari ho to aap ise start kar sakt hain. आलू की खेती अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए गए नई जानकारी के आधार पर की जाए तो किसानो को बहुत लाभ हो सकता है । आलू की खेती कब कहाँ और कैसे करने से अधिक फसल की प्राप्ति होती है इसकी पूरी जानकारी हम आपको निचे बताने जा रहे है । Aloo ki Kheti Kaise Vaigyanik Tarike se Kare Agar aapke pass khali aur badi jamin khali padi hui ho jis par kuch kaam naa ho raha ho to us par aap scientific tarike se aloo ki kheti kar ke lakhon mein kama sakte hain. Sabse acchi baat yah hai ki Potato ki farming mein aapko 2 se 3 months andar tak return mil jata hai. Aur saath he saath Aloo ki price and demand bhi acchi hai. आलू उत्पादन के लिए भूमि का चयन व तैयारी :- आलू की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी वाली जमीन सबसे सर्वश्रेष्ठ मानी जाति है । इसकी खेती में जल निकासी का management भी अत्यंत जरुरी होता है । चूँकि आलू का कंद मिट्टी के भीतर हीं तैयार होता है इसलिए मिट्टी का अच्छी तरह से भुरभुरा होना अत्यंत आवयशक है । मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए पहले खेत की 3 से 4 times जोताई कर के फिर उसे भुरभुरा कर लें । जलवायु आलू की खेती में तापमान (temperature) का विशेष रूप से योगदान होता है। आलू की खेती के लिए ठंडी जलवायु की अव्यश्कता होती है । फसल की अधिक पैदावार के लिए temperature का कम होना जरुरी होता है । आलू की फसल की अलग अलग अवस्थाओं में पौधों को अलग अलग temperature की अव्यश्कता होती है । आलू के पौधों को starting में बढ़ने के लिए temperature लगभग 25 डिग्री से. होना चाहिए । उसके बाद पौधों के उचित विकास के लिए लगभग 18 डिग्री से. temperature की जरुरत पड़ती है । अधिक कंद के उत्पादन के लिए कम से कम 20 डिग्री से. तक का temperature होना चाहिए । अगर temperature 30 डिग्री से. से अधिक होता है तो कंद का उत्पादन कम हो सकता है । आलू की प्रजातियाँ / Varieties of Potato कुफरी चन्द्र मुखी – ये आलू लगभग 90 days में तैयार होती है । कुफरी अलंकार – ये आलू लगभग 70 days में तैयार होती है । कुफरी शीत मान – इसे तैयार होने में लगभग 100 -120 days लग जाता है । कुफरी सिंदूरी – ये आलू लगभग 140 days में तैयार होती है । कुफरी लालिमा – यह आलू लगभग 90 days में तैयार होती है । इसके अलावा भी आलू के कई प्रजातियाँ होती है जैसे की कुफरी नवताल G 2524, कुफरी बहार 3792 E, कुफरी स्वर्ण, कुफरी जवाहर, कुफरी संतुलज, कुफरी अशोक आदि । बीज का चुनाव व बुआई का समय / Selection of Potato Seeds and Timing फसल की अच्छी पैदावार के लिए स्वच्छ बीज का उपयोग करना चाहिए । 25 gram से 100 gram तक के वजन के कंद को बीज के रूप में उपयोग किये जा सकते है । ज्यादा profit के लिए 3 cm से 3.5 cm आकार के आलूओं को हीं बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए । उत्तर और पश्चिम देशो में आलू की बुआई October के starting में हीं कर देना चाहिए। इसके अलावा पूर्वी भारत में October के बिच से January तक आलू की बुआई की जा सकती है । बीजोपचार व रोपन आलू की खेती करने में बीज को उपचारित(treated) कर के हीं उसकी बुआई करनी चाहिए। बीजो को उपचारित करने के लिए 5 liter मट्ठा में 15 gram हिंग पीस कर अच्छी तरह से mix कर के उसमे बीजों को उपचारित कर के उसे कुछ देर तक अच्छे से सुखा कर हीं बोना चाहिए । फसल के अच्छे उपज के लिए बीज बोने समय पंक्तियों की दूरी 50 cm की और पौधों से पौधों की दूरी लगभग 25 cm की होनी चाहिए। खाद प्रबंधन आलू की खेती करने से पहले खेत में लगभग 60 टन सड़ी हुई गोबर की खाद, 20kg नीम की खली, और 20 kg अरंडी की खली को एक साथ mix कर के भूमि में समान मात्रा में छिडकाव कर के खेत की अच्छे से जुताई कर देनी चाहिए और फिर बीज की बुआई करनी चाहिए। बीज बोने के लगभग 30 दिन के बाद 10 liter गौमूत्र में नीम का काढ़ा mix कर के उसे अच्छे से फसल के सभी तरफ छिडकाव कर दें। सिंचाई प्रबंधन आलू की खेती में पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत करनी चाहिए इसके बाद हर लगभग 15 दिन के interval पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। आलू की सिंचाई करने समय इस बात का ध्यान रखें की नालियाँ ¾ से अधिक ना भरनी पाए। जब आलू की खुदाई करने का समय आ जाये तो उससे 10 दिन पूर्व सिंचाई करना रोक देना चाहिए। खरपतवार आलू की खेती में मिट्टी चढ़ाने से पहले हीं खरपतवार की समस्या ज्यादा होती है। बीज बोने के बाद निराई गुड़ाई कर के जब उस पर मिट्टी चढ़ा दिया जाता है तो खरपतवार की समस्या थोड़ी कम हो जाती है। अतः खरपतवार निकलने पर time time पर उसकी निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए । कीट व रोग नियंत्रण चैपा कीट – यह कीट dark green या dark black color के होते है। यह कीट शाखाओं से रस चूस लेती है जिसके वजह से इसके पत्ते निचे की तरफ मुड़ जाते है। इससे बचाव के लिए 5 liter मट्ठा में 5 kg नीम की पत्ती को mix कर के उसे लगभग 40 दिनों के लिए सड़ने के लिए छोड़ दें। जब ये मिश्रण पूरी तरह से सड़ जाये तो उसे 200 liter पानी के साथ mix कर के उसका छिड़काव करे । कुतरा कीट – यह किट आलू के वनस्पति, शाखाओं और इसके निकलते हुए कंदों को प्रभावित करती है। इससे बचने के लिए लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । अगेती अंगमारी रोग – यह रोग पत्तियों के निचे से start हो कर ऊपर की तरफ बढ़ता है । इस रोग में पत्तीयों पर छोटे छोटे गोल आकार के धब्बे पर जाते है । इस रोग से बचने के लिए भी लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । काली रुसी रोग – यह रोग एक प्रकार के फफूंदी के वजह से लगता है । इस फफूंदी का आक्रमण बीज बुआई के बाद हीं शुरु होता जाता है । इससे बचने के लिए लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । आलू की खुदाई जब आप खेत की खुदाई कर रहें हो तो सभी कटे और सड़े हुए कंदों को छांट कर अलग कर दें । आलू को बोरो मर भरने समय इस बात कर ध्यान रहे की आलू के ऊपर से उसके छिलके नहीं उतरने चाहिए । आलू का भंडारण आलू बहुत जल्द सड़ने लगता है इसलिए इसका भंडारण अच्छे से करना बहुत हीं जरुरी होता है । जिस जगह का तापमान कम होता है उस जगह आलू का भंडारण करना ज्यादा मुश्किल नहीं होता है। आलू के भंडारण के लिए temperature लगभग 2.5 डिग्री से. से ज्यादा नही होनी चाहिए ।

Potatoes farming

Aloo ki Vaigyanik Kheti – आलू की खेती Sabji ka raja Aloo ki uchit kheti kar ke aap lakhon mein aasani se kama sakte hain. Agar aap hardworking hain aur iski scientific jankari ho to aap ise start kar sakt hain. आलू की खेती अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए गए नई जानकारी के आधार पर की जाए तो किसानो को बहुत लाभ हो सकता है । आलू की खेती कब कहाँ और कैसे करने से अधिक फसल की प्राप्ति होती है इसकी पूरी जानकारी हम आपको निचे बताने जा रहे है । Aloo ki Kheti Kaise Vaigyanik Tarike se Kare Agar aapke pass khali aur badi jamin khali padi hui ho jis par kuch kaam naa ho raha ho to us par aap scientific tarike se aloo ki kheti kar ke lakhon mein kama sakte hain. Sabse acchi baat yah hai ki Potato ki farming mein aapko 2 se 3 months andar tak return mil jata hai. Aur saath he saath Aloo ki price and demand bhi acchi hai. आलू उत्पादन के लिए भूमि का चयन व तैयारी :- आलू की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी वाली जमीन सबसे सर्वश्रेष्ठ मानी जाति है । इसकी खेती में जल निकासी का management भी अत्यंत जरुरी होता है । चूँकि आलू का कंद मिट्टी के भीतर हीं तैयार होता है इसलिए मिट्टी का अच्छी तरह से भुरभुरा होना अत्यंत आवयशक है । मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए पहले खेत की 3 से 4 times जोताई कर के फिर उसे भुरभुरा कर लें । जलवायु आलू की खेती में तापमान (temperature) का विशेष रूप से योगदान होता है। आलू की खेती के लिए ठंडी जलवायु की अव्यश्कता होती है । फसल की अधिक पैदावार के लिए temperature का कम होना जरुरी होता है । आलू की फसल की अलग अलग अवस्थाओं में पौधों को अलग अलग temperature की अव्यश्कता होती है । आलू के पौधों को starting में बढ़ने के लिए temperature लगभग 25 डिग्री से. होना चाहिए । उसके बाद पौधों के उचित विकास के लिए लगभग 18 डिग्री से. temperature की जरुरत पड़ती है । अधिक कंद के उत्पादन के लिए कम से कम 20 डिग्री से. तक का temperature होना चाहिए । अगर temperature 30 डिग्री से. से अधिक होता है तो कंद का उत्पादन कम हो सकता है । आलू की प्रजातियाँ / Varieties of Potato कुफरी चन्द्र मुखी – ये आलू लगभग 90 days में तैयार होती है । कुफरी अलंकार – ये आलू लगभग 70 days में तैयार होती है । कुफरी शीत मान – इसे तैयार होने में लगभग 100 -120 days लग जाता है । कुफरी सिंदूरी – ये आलू लगभग 140 days में तैयार होती है । कुफरी लालिमा – यह आलू लगभग 90 days में तैयार होती है । इसके अलावा भी आलू के कई प्रजातियाँ होती है जैसे की कुफरी नवताल G 2524, कुफरी बहार 3792 E, कुफरी स्वर्ण, कुफरी जवाहर, कुफरी संतुलज, कुफरी अशोक आदि । बीज का चुनाव व बुआई का समय / Selection of Potato Seeds and Timing फसल की अच्छी पैदावार के लिए स्वच्छ बीज का उपयोग करना चाहिए । 25 gram से 100 gram तक के वजन के कंद को बीज के रूप में उपयोग किये जा सकते है । ज्यादा profit के लिए 3 cm से 3.5 cm आकार के आलूओं को हीं बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए । उत्तर और पश्चिम देशो में आलू की बुआई October के starting में हीं कर देना चाहिए। इसके अलावा पूर्वी भारत में October के बिच से January तक आलू की बुआई की जा सकती है । बीजोपचार व रोपन आलू की खेती करने में बीज को उपचारित(treated) कर के हीं उसकी बुआई करनी चाहिए। बीजो को उपचारित करने के लिए 5 liter मट्ठा में 15 gram हिंग पीस कर अच्छी तरह से mix कर के उसमे बीजों को उपचारित कर के उसे कुछ देर तक अच्छे से सुखा कर हीं बोना चाहिए । फसल के अच्छे उपज के लिए बीज बोने समय पंक्तियों की दूरी 50 cm की और पौधों से पौधों की दूरी लगभग 25 cm की होनी चाहिए। खाद प्रबंधन आलू की खेती करने से पहले खेत में लगभग 60 टन सड़ी हुई गोबर की खाद, 20kg नीम की खली, और 20 kg अरंडी की खली को एक साथ mix कर के भूमि में समान मात्रा में छिडकाव कर के खेत की अच्छे से जुताई कर देनी चाहिए और फिर बीज की बुआई करनी चाहिए। बीज बोने के लगभग 30 दिन के बाद 10 liter गौमूत्र में नीम का काढ़ा mix कर के उसे अच्छे से फसल के सभी तरफ छिडकाव कर दें। सिंचाई प्रबंधन आलू की खेती में पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत करनी चाहिए इसके बाद हर लगभग 15 दिन के interval पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। आलू की सिंचाई करने समय इस बात का ध्यान रखें की नालियाँ ¾ से अधिक ना भरनी पाए। जब आलू की खुदाई करने का समय आ जाये तो उससे 10 दिन पूर्व सिंचाई करना रोक देना चाहिए। खरपतवार आलू की खेती में मिट्टी चढ़ाने से पहले हीं खरपतवार की समस्या ज्यादा होती है। बीज बोने के बाद निराई गुड़ाई कर के जब उस पर मिट्टी चढ़ा दिया जाता है तो खरपतवार की समस्या थोड़ी कम हो जाती है। अतः खरपतवार निकलने पर time time पर उसकी निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए । कीट व रोग नियंत्रण चैपा कीट – यह कीट dark green या dark black color के होते है। यह कीट शाखाओं से रस चूस लेती है जिसके वजह से इसके पत्ते निचे की तरफ मुड़ जाते है। इससे बचाव के लिए 5 liter मट्ठा में 5 kg नीम की पत्ती को mix कर के उसे लगभग 40 दिनों के लिए सड़ने के लिए छोड़ दें। जब ये मिश्रण पूरी तरह से सड़ जाये तो उसे 200 liter पानी के साथ mix कर के उसका छिड़काव करे । कुतरा कीट – यह किट आलू के वनस्पति, शाखाओं और इसके निकलते हुए कंदों को प्रभावित करती है। इससे बचने के लिए लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । अगेती अंगमारी रोग – यह रोग पत्तियों के निचे से start हो कर ऊपर की तरफ बढ़ता है । इस रोग में पत्तीयों पर छोटे छोटे गोल आकार के धब्बे पर जाते है । इस रोग से बचने के लिए भी लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । काली रुसी रोग – यह रोग एक प्रकार के फफूंदी के वजह से लगता है । इस फफूंदी का आक्रमण बीज बुआई के बाद हीं शुरु होता जाता है । इससे बचने के लिए लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे पानी में mix कर के इसका छिडकाव पम्प से कीजिये । आलू की खुदाई जब आप खेत की खुदाई कर रहें हो तो सभी कटे और सड़े हुए कंदों को छांट कर अलग कर दें । आलू को बोरो मर भरने समय इस बात कर ध्यान रहे की आलू के ऊपर से उसके छिलके नहीं उतरने चाहिए । आलू का भंडारण आलू बहुत जल्द सड़ने लगता है इसलिए इसका भंडारण अच्छे से करना बहुत हीं जरुरी होता है । जिस जगह का तापमान कम होता है उस जगह आलू का भंडारण करना ज्यादा मुश्किल नहीं होता है। आलू के भंडारण के लिए temperature लगभग 2.5 डिग्री से. से ज्यादा नही होनी चाहिए ।