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1803920
indian farming
indian farming
Monday, 13 June 2016
Mushroom farming..
Mushroom ki Kheti Aur Business Kaise
Kare (हिंदी)
मशरुम का बिज़नेस (Mushroom business)
एक ऐसा व्यापार है जो की कम
पूंजी, कम जगह और कम समय में
अच्छा return दे सकता है | Mushroom ki
kheti kaise kare कोई rocket science
नहीं है | आप थोड़ी
सी मेहनत और लगन से mushroom
ke business को उचाई तक ले जा सकते हैं |
मैंने खुद मशरुम की बिज़नेस किया था
परन्तु अच्छा business partner
नहीं मिलने के कारण मुझे बिच में
ही छोड़ना पड़ा | लेकिन मैं अपने अनुभव
से बतला सकता हूँ की mushroom
एक profitable business है जो कम समय में
अच्छा return दे सकता है | और हाँ अगर आप
ghar baithe किसी business के बारे
में सोच रहे है, तो mushroom बिज़नेस आपके
लिए है | चलिए mushroom ke kheti ki
adhik se adhik jankri हासिल करे ise
kaise karte hai और व्यापार कैसे किया जाये |
तो चलिए जानते है की कैसे मशरुम
व्यापार की सुरुवात किया जाये और किन
किन चीजों की जरुरत
होगी |
Space Requirement
मशरुम की खेती करने से
पहले आपको यह तय करना होगा की
आप कितना उत्पादन करना चाहते है और
उसी की अनुसार space
की जरुरत होगी | एक
medium मशरुम के पैकेट से आप लगभग 1 से
4 kg तक आसानी से उत्पादन कर
सकते हैं | अगर आप केवल सुरुवात कर के देखना
चाहते है की मशरुम का बिज़नेस कर
पाएंगे या नहीं तो उसके लिए 300 Sq
feet की जगह लगेगी |
और हाँ ध्यान रखे की जिस place पर
आप mushroom business setup करने जा
रहे है वो market से ज्यादा दूर नहीं
हो | आप चाहे तो घर की
पीछे भी इसे start कर
सकते है, परन्तु जगह पूरा बंद होना चाहिये |
Things Required
इसकी खेती के लिए आपको
मशरुम को उगाना पड़ेगा और इसे 3 तरह से किया जा
सकता है :
1. Bed बना कर
2. लटका (hang) कर
3. जमीन से थोड़ी
उचाई पर रख कर
Bed बना कर
अगर आप सुरुवात कर रहे है तो कोशिश करें
की कम से कम investment में
mushroom का business start करें | इसके
लिए आप चाहे तो बांस (bamboo) से बेड-नुमा
आकार के bed तैयार कर सकते है जिसके ऊपर
मशरुम को रखा जा सकता है | यह
तरीका काफी सस्ता और
affordable भी है |
लटका (hang) कर
इस विधि में मशरुम के packet को लटका (hang)
कर के रखा जाता है | इस तरीके से
आप कम से कम place में ज्यादा से ज्यादा
mushroom उगा सकते हैं | इसे समझाने के लिए
मैंने यह picture यहाँ share की है
ताकि आपको अच्छे से idea मालूम चल सके |
जमीन से थोड़ी उचाई पर
रख कर
इस विधि में मशरुम के पैकेट या बीज को
को बिना किसी सहारे के सीधे
जमीन पर रख कर उगाया जाता है |
Types of Mushroom
India में मुख्यतः 2 तरह के mushroom उपयोग
में लाये जाते है:
1. Oyster Mushrooms
2. Button Mushroom
आप decide कर लें की आपको किस
मशरूम की खेती
करनी है, दोनों के अलग अलग फायदे,
demand और price (दाम) हैं market में |
वैसे button mushroom.
Mushroom Spawn
इसे mushroom ka bij (बीज)
भी बोलते है | इसी
बीज से मशरुम उगाया जाता है | वैसे तो
आप spawn को उगा भी सकते है
परन्तु अच्छा यही रहेगा
की आप किसी
नजदीक केंद्र से spawn
खरीद लें, जब आपका mushroom
ka business बढेगा तब आप spawn बनाने
की सोच सकते हैं |
Plastic Bags
आपको प्लास्टिक बैग की
भी जरुरत होगी ताकि मशरूम
के पैकेट बना कर बंधा जा सके | ध्यान रहे को यह
विधि केवल Oyster Mushrooms के लिए है |
अगर आप बटन मशरुम की
खेती करना चाहते है तो उसके लिए
आपको दूसरी तरीके से
खेती करनी
होगी | Plastic bag साधारण bag से
मोटी और मजबूत होगी |
आप इसे नजदीकी
market से खरीद सकते है | दुकान
वाले से बोले की mushroom पैकेट
बांधने के लिए मोटी प्लास्टिक दे जो
की 5 से 8 kg तक का वजन सह सके
|
भूसा या पुआल (Straw)
अब अगला काम है की आप पुआल
की इंतेजाम करे | इसके लिए आप
नजदीकी ग्वाले (दूध वाले )
से संपर्क कर के मालूम कर सकते है
की कहाँ पर पुआल मिलेगा |
सुरुवाती तौर पर आप 5 से 6 बोड़ा भूसा
ले कर रख सकते है | शुरुवात के लिए
इतनी मात्रा enough होगी
| ध्यान रहे की पुआल ज्यादा
बड़ी नहीं होने चाहिये और
ना ही बिलकुल छोटी | 1/2
इंच का पुआल ठीक रहेगा | एक बड़े
बाल्टी या टब में जरुरत के हिसाब से
भूसा को दाल कर उसमें अच्छी मात्र में
पानी दाल कर रात भर छोड़ दें | इसमें
एक liquid भी मिलाना पड़ता है (आप
किसी mushroom किसान से इसके बारे
में पूछताछ कर सकते हैं) |
रात भर छोड़ने के बाद इसे टब से निकाल कर
पानी गिरने दे और धुप में 2 से 4 घंटे के
लिए छोड़ दें | ध्यान रहे की पुआल ना
ही बिलकुल गिला और ना ही
बिलकुल सुखा होना चाहिये | अब इसे उठा कर अन्दर
ले जाये जहाँ पर इसे पैकेट में बांधा जायेगा, बड़े से
प्लास्टिक के ऊपर रख कर फैला दें और 2 से 3
घंटे के लिए fan on कर के छोड़ दे ताकि अतिरिक्त
नमी निकाल जाये | ध्यान रहे
की पुआल को साफ़ जगह पर
ही रखे | अगर आपको मालूम करना है
की पुआल ready हो गया है या
नहीं तो सबसे अच्छा तरीका
मालूम करने का यह है की पुआल को
मुट्ठी में दबा कर देखे की
पानी गिरता है या नहीं |
अगर मुट्ठी में पुआल को जोर से दबाने
से पानी नहीं गिरता है तो
समझे की पुआल ready है
mushroom packet बांधने के लिए |
Mushroom Packet बांधे
अब आप प्लास्टिक को निचे से रस्सी
(plastic rope) से बांध दें (अगर निचे से प्लाटिक
कटी हुई हो तो) |
अब इसमें 1/2 inch तक पुआल फैला कर भरे
और इसके ऊपर किनारे किनारे mushroom
spawn को थोडा थोडा कर के दाल दें | 20 से
25 mushroom spawn के दाने को बिच में
भी फैला कर दाल दें | अब इसके ऊपर
फिर से 1/2 इंच तक पुआल डाले और फिर
से mushroom spawn को किनारे दाल दें | इस
प्रक्रिया को तब 6 से 8 बार दोहराये ताकि 6 से 8
layer बन सके |
ध्यान रहे की पुआल को भरने समय,
इसे हल्का हल्का दबाते जाये | अब ऊपर से
भी थोड़ी मात्र में मशरुम
स्पान दाल कर इसे अच्छे से ऊपर से बांध दें | अब
इसे साफ़ छोटी चीज
(लकड़ी या पिन) से प्लास्टिक में जगह
जगह hole कर देइउन ताकि इसमें से मशरुम बाहर
निकाल पाये | आपका mushroom pack ready
है |
अब इसे तैयार stand में रस्सी के
सहारे टांग दे जैसे निचे दिखाया गया है
Notes
निचे दिए गये कुछ महत्वपूर्ण mushroom ki
kheti की jankari और tips दिए गए
हैं जिसे आप अपनाकर mushroom business
project को काफी अच्छी
तरह से आगे ले जा सकते हैं |
Mushroom packet को हमेशा dark
और अँधेरे जगह रखे |
धुप बिलकुल नहीं
आनी चाहिए |
खिड़कियाँ (windows) को हमेशा
भींगे हुए बोदे से ढक कर रखे
ताकि room में Moisture बना रहे |
Room में जाने से पहले अपने चप्पल या
जूते खोल कर जाये |
अपने हाथ और पैर को साबुन (liquid
soap) से अच्छी तरह धो कर
ही room में जायें |
समय समय पर (1 से 2 दिन में)
हल्की हल्की
पानी से mushroom के पैकेट
के ऊपर बौछार किया करे, ताकि
नमी बरकरार रहे |
मशरुम उगाने में लगने वाला समय
देखा जाये तो mushroom ko ugane mein
लगभग 1 से 2 week लगता है और यह 4 से 6
week तक उत्पादन देता है | परन्तु 3 से 4
week के बाद production धीरे
धीरे कम होने लगता है |
Market
फिलहाल Oyster Mushrooms का market दाम
(rate) लगभग Rs 100 से 120 तक है | आप
आसानी से Rs 60 से 80 तक रिटेलर
(retailer) को बेच (sale\) कर सकते हैं |
ठीक उसी तरह Button
Mushroom का market rate लगभग Rs 180
से ले कर Rs 250 तक है | इसे बेचने के लिए
आप सब्जी बेचने वाले से बात कर
की उनको sale कर सकते है या फिर
directly customers तो market rate से थोडा
कम दाम से sale कर सकते है और अच्छा मुनाफा
कम सकते हैं |
Mushroom को किसी अच्छे
transparent plastic bag में बंद
(सील) कर के भी आप
अच्छा rate ले सकते हैं |
Garlic(lahsun) farming.
Lahsun ki Vaigyanik Kheti – लहसुन
की खेती
Yakin maniye Lahsun ki uchit kheti kar
ke aap lakho mein kama sakte hain.
Jahan tak kaise kare ka sawal hai,
apke pass kewal acchi jankari aur
Vaigyanik tarike ko apnakar start kiya
jaa sakta hai. लहसुन की
खेती को अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए
गए तरीके से की जाये तो
किसानो को बहुत कम खर्च में अच्छा benefits हो
सकता है । अगर भूमि और फसल की
अच्छे से देखभाल की जाये तो किसानो को
प्रति hectare 100 से 200 क्विंटल उपज मिल
जाती है। वैज्ञानिको द्वारा लहसुन
की खेती के लिए
कैसी भूमि होनी चाहिए, खेत
में कब और कितना खाद देना चाहिए, कब कब सिंचाई
करनी चाहिए आदि की
जानकारी हम आपको निचे बताएँगे ।
Lahsun ki Kheti Kaise Kare
Agar aapke pass badi se jamin hai
aur sahi tarike se Garlic ki kheti ki
jaye to aap lakhon mein aasani se 3
months mein kama sakte hai. Iske liye
aapko Vaigyanik tarike ko apnakar
lahsun ki uchit kheti karni hogi aur
hard work ke saath aap isse accha
business kar sakte hai.
खेती के लिए भूमि का चयन/
Selection of Land
लहसुन की खेती के लिए
दोमट भूमि जिसमे जल निकलने की
प्रबंध अच्छी हो उसे सबसे उत्तम
माना जाता है । लहसुन की
खेती शुरु करने से पूर्व भूमि
की जुताई कर के उसे भुरभुरा बना कर
उसपर पाटा चला देना चाहिए इससे
भुरभुरी भूमि फिर से समतल हो
जाती है ।
खेती के लिए जलवायु
लहसुन की खेती के लिए
ठंडी जलवायु की जरुरत
पड़ती है क्योंकि ठंड में दिन छोटा होने के
कारण कंद का उत्पादन अच्छे से होता है ।
लहसुन की खेती समुद्र के
level से 1000-1400m तक कि ऊंचाई पर
की जा सकती है। लहसुन
की खेती के लिए लगभग
30 से 35 डिग्री से. तक का
temperature और लगभग 10 घंटे का दिन को
उत्तम माना जाता है ।
बीजोपचार / बीज बुवाई
लहसुन की खेती में
बीज बुवाई से पूर्व बीजों को
Kerosene से उपचारित कर लेना चाहिए।
बीज बोने के लिए भूमि को 4 से 5cm
गहरा खोद लेना चाहिए। फसल की
अच्छी उपज हेतु लहसुन को डबलिंग
विधि से बोना चाहिए । बुवाई करने वक्त कतार से
कतार की दुरी लगभग
15cm और पौधों से पौधों की
दूरी लगभग 8cm होनी
चाहिए ।
खाद प्रबंधन
लहसुन के अधिक उत्पादन के लिए एक एकड़ के
हिसाब से लगभग 25 ton सड़ी हुई
गोबर की खाद को खेत में डाल दें। इसके
अलावा 50kg भू-पावर, 40 kg माइक्रो
फर्टीसिटी कम्पोस्ट ,
10kg माइक्रो भू-पावर, 10kg सुपर गोल्ड
कैल्सीफर्ट, 50 kg अरंडी
की खली और 20kg
माइक्रो नीम, को अच्छी
तरह एक साथ mix कर के तैयार लें और फिर खेत
में समान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर खेत तैयार
करें उसके बाद बीज की
बुवाई करे | .
बीज बोने के लगभग 25 दिन बाद उसमे
1 kg सुपर गोल्ड मैनिशियम और 500 माइक्रो झाइम
को 400ml पानी में घोल बनाकर पम्प
द्वारा खेत में छिड़काव करें उसके बाद हर 15 से 20
दिन के interval में दूसरा और तीसरा
छिड़काव करे ।
खरपतवार नियंत्रण
लहसुन की खेती में
खरपतवार को नष्ट करने हेतु इसकी
निराई गुड़ाई जरुर से करें। पहली निराई
गुड़ाई बीज बोने के लगभग 25 दिन बाद
खुरपी से करें । फिर दूसरी
निराई गुड़ाई लगभग 50 दिन के बाद करें।
सिंचाई /जल प्रबंधन
लहसुन की खेती में फसल
की वृद्धि हेतु भूमि में नमी
का होना जरुरी होता है इसलिए
बीज बोने के तुरंत बाद
पहली सिंचाई कर देनी
चाहिए । उसके बाद हर 15 days के interval में
खेत की सिंचाई करनी चाहिए
।
रोग / किट नियंत्रण
लहसुन में लगने वाले रोग व किट इस प्रकार के होते
है :-
थ्रिप्स किट :– थ्रिप्स किट दिखने में छोटे छोटे व
पीले(yellow) रंग के होते है जो
की पत्तियों का रस चूस कर उसपर
सफ़ेद रंग के धब्बा बना देते है । इस किट से बचाव
के लिए नीम का काढ़ा बना कर माइक्रो
झाइम के साथ mix कर के 250ml
पानी में घोल कर पम्प से खेत में
छिड़काव करें ।
बैंगनी धब्बा रोग :- इस रोग में पत्तो पर
और तने पर छोटे छोटे गुलाबी(pink) रंग
के धब्बे हो जाते है। इस रोग से बचाव के लिए
नीम का काढ़ा बना कर माइक्रो झाइम के
साथ mix कर के 250ml पानी में घोल
कर पम्प से खेत में छिड़काव करें ।
स्टेमफिलियम ब्लाईट रोग :- नम weather में लगने
वाला यह रोग फफूंदी के कारण होता है।
इस रोग से बचाव के लिए नीम का काढ़ा
बना कर माइक्रो झाइम के साथ mix कर के 250ml
पानी में घोल कर पम्प से खेत में
छिड़काव करें ।
फसल की खुदाई
लहसुन का फसल 2 month में ready हो जाता
है । जब लहसुन का फसल तैयार हो जाता है तो
उसके पत्ते पीले हो कर नष्ट हो जाते
है। फसल तैयार होने के बाद कंदों को पौध सहित
खोद कर उखाड़ लेना चाहिए फिर उसका बण्डल
बनाकर 3 से 4 दिन तक धुप में सुखाया जाना चाहिए
Onion (pyaj) farming
Pyaj ki Kheti Kaise Kare – प्याज
की वैज्ञानिक खेती
Aaj ki is daur mein kaise pyaj ki kheti
kare ke log lakhon mein kama rahe
hai. Janiye kya hai sahi kheti karne ke
tarike, iske vaigyanik प्याज (onion) जिसे
किसी भी सब्जी
के साथ मिला दिया जाये तो उस सब्जी का
स्वाद बढ़ जाता है। प्याज बहुत दिनों तक खराब
नहीं होता है। बाज़ार में इसका भाव
बहुत हीं बढ़िया मिलता है इसलिए प्याज
की खेती करने से किसानो को
बहुत फायदा मिल सकता है । तो आइये जानते है
प्याज की खेती कैसे करने
से हमें ज्यादा profit हो सकता है ।
प्याज की खेती कैसे
करे / Payaj ki Vaigyanik Kheti
Aaj ke is daur mein pyaj ki kheti ek
aisa business hai jise kisan bhai uga
kar lakhon mein kama sakte hain. Agar
aap onion ki kehti karne ki soch rahe
hai to niche diye gaye tips ko follow
kar ke accha khasa kama sakte
hain. Iske saath saath thodi se jagah
mein aap anar phal ki kheti bhi kar
sakte hain aur adhik labh kama sakte
hain. To aiye jante hai kaise kare pyaj
ki adhunik tarike se aur kamay dhre
sare paise.
जमीन/ भूमि की
तैयारी
प्याज की सफल खेती में
5.8 से 6.5 के बिच के पी.एच. मान
वाले जीवांशयुक्त हल्की
दोमट भूमि या बलूई दोमट भूमि को श्रेष्ठ माना जाता
है। खेती करने से पहले भूमि
की अच्छे से साफ़ सफाई कर के उसे
भुरभुरा बना लेना चाहिए।
जलवायु
प्याज की खेती हर तरह
की जलवायु में किया जा सकता है बस
थोड़ी सी
सावधानी से काम लिया जाये तो प्याज
की अच्छी उत्पादन संभव
है। इसकी खेती के लिए ना
ज्यादा गर्मी ना ज्यादा ठंड का मौसम
सबसे सर्वोतम होता है । इसलिए
छत्तीसगढ़ को प्याज के उत्पादन के
लिए अनुकुल माना जाता है । कृषि वैज्ञानिको द्वारा
प्याज की खेती पर तापमान
का गहरा प्रभाव पड़ता है । अच्छी
वृद्धि के लिए 20 डिग्री से. से 27
डिग्री से. तक का तापमान प्याज में
अच्छी बढ़त लाता है। फल पकने समय
तापमान 30 डिग्री से. से 35
डिग्री से. तक मिल जाये तो और
भी बेहतर होता है ।
प्याज की प्रजाती
प्याज के 3 प्रकार प्रमुख है जो रंगों के आधार पर
है :-
लाल रंग के प्याज :- इस रंग के प्याज में उन्नत
किस्म के प्याज की प्रजाती
का नाम है जैसे उषा रेड, उषा माधवी
,पंजाब सिलेक्शन , अर्का निकेतन, ऐग्री
फाउंड dark red, ऐग्री फाउंड light
red आदि ।
पीले रंग के प्याज:- इस किस्म के
नाम इस प्रकार हुआ करते है – early green,
brown spanish आदि।
सफ़ेद रंग के प्याज :- इसके नाम इस प्रकार के
है – उषा white, उषा round, उषा flat, आदि ।
सिचाई / जल प्रबंधन
खेती करने के दवरान जल प्रबंधन का
खास ध्यान रखना चाहिए। रबी के प्याज
के लिए समय समय पर 10 से 12 बार सिचाई
की जरुरत होती है।
गर्मी में एक सप्ताह के अंतराल में
और ठंड के मौसम में 15 दिनों में सिचाई
करनी चाहिए। रबी के
फसल में जब पत्ते पीले होने लगे तो
सिचाई 15 दिन के लिए रोक देनी चाहिए
जिससे पीले पत्ते सुख जाए और फिर
खुदाई करके निकाले जा सके।
खाद प्रबंधन
कृषि वैज्ञानिको के द्वारा प्याज की
खेती के लिए 300 से 350 क्विंटल
अच्छी सड़ी हुई गोबर
की खाद प्रति हेकटेयर की
दर से भूमि तैयारी के समय
ही मिला देनी चाहिए।
नत्रजन(nitrogen) 80 kg, फास्फोरस
(phasphoras) 50 kg, और पोटाश(potash)
80 kg प्रति हेक्टेयर की आवश्कता
पड़ती है। पोटाश और फास्फोरस
की पूरी मात्रा और नत्रजन
की आधी मात्रा खेत
की अंतिम तैयारी के साथ या
रोपाई से पहले भूमि में मिला देनी चाहिए।
बाकि आधी बची हुई
नत्रजन दो बार में पहला रोपाई के 30 दिनों के बाद
और दूसरा 45 दिनों के बाद छिड़काव के साथ दे ।
खरपतवार की सफाई
इसके फसल में खरपतवार को निकालना आवश्यक
होता है अन्यथा उपज काफी प्रभावित
होती है । इसको नियंत्रित करने के लिए
रोपाई से पहले 2kg वासालीन प्रति
हेक्टेयर की दर से भूमि में छिड़क कर
मिला दे और फिर 45 दिनों के बाद एक जुताई कर के
खरपतवार को नियंत्रित किया जाना चाहिए ।
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों
को नियंत्रित करने के लिए 2.5kg टेनोरान प्रति
हेक्टेयर की दर से 800
लीटर पानी में मिलाकर रोपाई
के 20 से 25 दिनों के बाद छिड़काव किया जाना चाहिए
।
किट पतंग / रोग नियंत्रण
प्याज की फसल में पाए जाने वाले
बैगनी धब्बा रोग सबसे प्रमुख रोग होते
है। इस रोग में पत्तियों पर आरम्भ में
पीले से सफ़ेद धसे हुए धब्बे लगते है
जिनके बिच का भाग बैगनी रंग का होता है
। यह रोग तेजी से बढ़ता है और पत्तियों
से फैलकर बिच के स्तंभों में पहुँच जाता है । इस
रोग के प्रभाव से प्याज का भंडारण करना मुश्किल
हो जाता है क्योंकि इस दरम्यान प्याज अधिक मात्रा
में गलने लगता है । इस रोग के लगते
हीं इसमें कोई फफूंदनाशक दवा जैसे
copper oxychloride का वैज्ञानिक विधि
इस्तेमाल करके इस रोग से बचा जा सकता है।
इसके अलावा कुछ किट ऐसे भी होते है
जो प्याज के पत्तो के बाहरी त्वचा को
खरोच कर रस चूसते है जिससे पत्तियों पर असंख्य
छोटे छोटे सफ़ेद धब्बे बन जाते है । समय रहते
अगर किसान इसे नियंत्रित नहीं कर पाए
तो प्याज में निरुपता आ जाती है साथ
हीं लगभग 25% उपज कम हो
जाती है ।
Jab payaj ki fasal tayyar ho jaye to
mandi mein yaa phir sidhe khudra
bajar mein jaa kar bech dein aur
accha fayde kamaye.
Potatoes farming
Aloo ki Vaigyanik Kheti – आलू
की खेती
Sabji ka raja Aloo ki uchit kheti kar ke
aap lakhon mein aasani se kama sakte
hain. Agar aap hardworking hain aur
iski scientific jankari ho to aap ise
start kar sakt hain. आलू की
खेती अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए गए
नई जानकारी के आधार पर
की जाए तो किसानो को बहुत लाभ हो
सकता है । आलू की खेती
कब कहाँ और कैसे करने से अधिक फसल
की प्राप्ति होती है
इसकी पूरी
जानकारी हम आपको निचे बताने जा रहे
है ।
Aloo ki Kheti Kaise Vaigyanik Tarike
se Kare
Agar aapke pass khali aur badi jamin
khali padi hui ho jis par kuch kaam
naa ho raha ho to us par aap scientific
tarike se aloo ki kheti kar ke lakhon
mein kama sakte hain. Sabse acchi
baat yah hai ki Potato ki farming mein
aapko 2 se 3 months andar tak return
mil jata hai. Aur saath he saath Aloo
ki price and demand bhi acchi hai.
आलू उत्पादन के लिए भूमि का चयन व
तैयारी :-
आलू की खेती के लिए
रेतीली दोमट
मिट्टी वाली
जमीन सबसे सर्वश्रेष्ठ
मानी जाति है । इसकी
खेती में जल निकासी का
management भी अत्यंत
जरुरी होता है । चूँकि आलू का कंद
मिट्टी के भीतर
हीं तैयार होता है इसलिए
मिट्टी का अच्छी तरह से
भुरभुरा होना अत्यंत आवयशक है ।
मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए पहले
खेत की 3 से 4 times जोताई कर के
फिर उसे भुरभुरा कर लें ।
जलवायु
आलू की खेती में तापमान
(temperature) का विशेष रूप से योगदान होता है।
आलू की खेती के लिए
ठंडी जलवायु की
अव्यश्कता होती है । फसल
की अधिक पैदावार के लिए
temperature का कम होना जरुरी
होता है । आलू की फसल
की अलग अलग अवस्थाओं में पौधों को
अलग अलग temperature की
अव्यश्कता होती है । आलू के पौधों को
starting में बढ़ने के लिए temperature लगभग
25 डिग्री से. होना चाहिए । उसके बाद
पौधों के उचित विकास के लिए लगभग 18
डिग्री से. temperature
की जरुरत पड़ती है ।
अधिक कंद के उत्पादन के लिए कम से कम 20
डिग्री से. तक का temperature होना
चाहिए । अगर temperature 30
डिग्री से. से अधिक होता है तो कंद का
उत्पादन कम हो सकता है ।
आलू की प्रजातियाँ / Varieties of
Potato
कुफरी चन्द्र मुखी
– ये आलू लगभग 90 days में तैयार
होती है ।
कुफरी अलंकार – ये आलू
लगभग 70 days में तैयार
होती है ।
कुफरी शीत मान –
इसे तैयार होने में लगभग 100 -120
days लग जाता है ।
कुफरी सिंदूरी – ये
आलू लगभग 140 days में तैयार
होती है ।
कुफरी लालिमा – यह आलू
लगभग 90 days में तैयार
होती है ।
इसके अलावा भी आलू के कई
प्रजातियाँ होती है जैसे
की कुफरी नवताल
G 2524, कुफरी बहार 3792
E, कुफरी स्वर्ण,
कुफरी जवाहर,
कुफरी संतुलज,
कुफरी अशोक आदि ।
बीज का चुनाव व बुआई का समय /
Selection of Potato Seeds and Timing
फसल की अच्छी पैदावार के
लिए स्वच्छ बीज का उपयोग करना
चाहिए । 25 gram से 100 gram तक के वजन
के कंद को बीज के रूप में उपयोग किये
जा सकते है । ज्यादा profit के लिए 3 cm से
3.5 cm आकार के आलूओं को हीं
बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए ।
उत्तर और पश्चिम देशो में आलू की
बुआई October के starting में हीं
कर देना चाहिए। इसके अलावा पूर्वी
भारत में October के बिच से January तक आलू
की बुआई की जा
सकती है ।
बीजोपचार व रोपन
आलू की खेती करने में
बीज को उपचारित(treated) कर के
हीं उसकी बुआई
करनी चाहिए। बीजो को
उपचारित करने के लिए 5 liter मट्ठा में 15 gram
हिंग पीस कर अच्छी तरह
से mix कर के उसमे बीजों को उपचारित
कर के उसे कुछ देर तक अच्छे से सुखा कर
हीं बोना चाहिए ।
फसल के अच्छे उपज के लिए बीज
बोने समय पंक्तियों की दूरी
50 cm की और पौधों से पौधों
की दूरी लगभग 25 cm
की होनी चाहिए।
खाद प्रबंधन
आलू की खेती करने से
पहले खेत में लगभग 60 टन सड़ी हुई
गोबर की खाद, 20kg नीम
की खली, और 20 kg
अरंडी की खली
को एक साथ mix कर के भूमि में समान मात्रा में
छिडकाव कर के खेत की अच्छे से
जुताई कर देनी चाहिए और फिर
बीज की बुआई
करनी चाहिए। बीज बोने के
लगभग 30 दिन के बाद 10 liter गौमूत्र में
नीम का काढ़ा mix कर के उसे अच्छे से
फसल के सभी तरफ छिडकाव कर दें।
सिंचाई प्रबंधन
आलू की खेती में
पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत
करनी चाहिए इसके बाद हर लगभग 15
दिन के
interval पर हल्की सिंचाई करते रहना
चाहिए। आलू की सिंचाई करने समय इस
बात का ध्यान रखें की नालियाँ ¾ से
अधिक ना भरनी पाए। जब आलू
की खुदाई करने का समय आ जाये तो
उससे 10 दिन पूर्व सिंचाई करना रोक देना चाहिए।
खरपतवार
आलू की खेती में
मिट्टी चढ़ाने से पहले हीं
खरपतवार की समस्या ज्यादा
होती है। बीज बोने के बाद
निराई गुड़ाई कर के जब उस पर मिट्टी
चढ़ा दिया जाता है तो खरपतवार की
समस्या थोड़ी कम हो जाती
है। अतः खरपतवार निकलने पर time time पर
उसकी निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए ।
कीट व रोग नियंत्रण
चैपा कीट – यह कीट
dark green या dark black color के होते है।
यह कीट शाखाओं से रस चूस
लेती है जिसके वजह से इसके पत्ते
निचे की तरफ मुड़ जाते है। इससे बचाव
के लिए 5 liter मट्ठा में 5 kg नीम
की पत्ती को mix कर के
उसे लगभग 40 दिनों के लिए सड़ने के लिए छोड़ दें।
जब ये मिश्रण पूरी तरह से सड़ जाये
तो उसे 200 liter पानी के साथ mix
कर के उसका छिड़काव करे ।
कुतरा कीट – यह किट आलू के
वनस्पति, शाखाओं और इसके निकलते हुए कंदों को
प्रभावित करती है। इससे बचने के लिए
लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ
की पत्ती mix कर के उसे
कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस
मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए।
अब इसे पानी में mix कर के इसका
छिडकाव पम्प से कीजिये ।
अगेती अंगमारी रोग – यह
रोग पत्तियों के निचे से start हो कर ऊपर
की तरफ बढ़ता है । इस रोग में
पत्तीयों पर छोटे छोटे गोल आकार के
धब्बे पर जाते है । इस रोग से बचने के लिए
भी लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg
अकौआ की पत्ती mix कर
के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और
फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर
लीजिए। अब इसे पानी में
mix कर के इसका छिडकाव पम्प से
कीजिये ।
काली रुसी रोग – यह रोग
एक प्रकार के फफूंदी के वजह से
लगता है । इस फफूंदी का आक्रमण
बीज बुआई के बाद हीं शुरु
होता जाता है । इससे बचने के लिए लगभग 10
liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की
पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक
सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को
उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे
पानी में mix कर के इसका छिडकाव
पम्प से कीजिये ।
आलू की खुदाई
जब आप खेत की खुदाई कर रहें हो तो
सभी कटे और सड़े हुए कंदों को छांट
कर अलग कर दें । आलू को बोरो मर भरने समय
इस बात कर ध्यान रहे की आलू के
ऊपर से उसके छिलके नहीं उतरने
चाहिए ।
आलू का भंडारण
आलू बहुत जल्द सड़ने लगता है इसलिए इसका
भंडारण अच्छे से करना बहुत हीं
जरुरी होता है । जिस जगह का तापमान
कम होता है उस जगह आलू का भंडारण करना
ज्यादा मुश्किल नहीं होता है। आलू के
भंडारण के लिए temperature लगभग 2.5
डिग्री से. से ज्यादा नही
होनी चाहिए ।
Potatoes farming
Aloo ki Vaigyanik Kheti – आलू
की खेती
Sabji ka raja Aloo ki uchit kheti kar ke
aap lakhon mein aasani se kama sakte
hain. Agar aap hardworking hain aur
iski scientific jankari ho to aap ise
start kar sakt hain. आलू की
खेती अगर कृषि वैज्ञानिक के बताए गए
नई जानकारी के आधार पर
की जाए तो किसानो को बहुत लाभ हो
सकता है । आलू की खेती
कब कहाँ और कैसे करने से अधिक फसल
की प्राप्ति होती है
इसकी पूरी
जानकारी हम आपको निचे बताने जा रहे
है ।
Aloo ki Kheti Kaise Vaigyanik Tarike
se Kare
Agar aapke pass khali aur badi jamin
khali padi hui ho jis par kuch kaam
naa ho raha ho to us par aap scientific
tarike se aloo ki kheti kar ke lakhon
mein kama sakte hain. Sabse acchi
baat yah hai ki Potato ki farming mein
aapko 2 se 3 months andar tak return
mil jata hai. Aur saath he saath Aloo
ki price and demand bhi acchi hai.
आलू उत्पादन के लिए भूमि का चयन व
तैयारी :-
आलू की खेती के लिए
रेतीली दोमट
मिट्टी वाली
जमीन सबसे सर्वश्रेष्ठ
मानी जाति है । इसकी
खेती में जल निकासी का
management भी अत्यंत
जरुरी होता है । चूँकि आलू का कंद
मिट्टी के भीतर
हीं तैयार होता है इसलिए
मिट्टी का अच्छी तरह से
भुरभुरा होना अत्यंत आवयशक है ।
मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए पहले
खेत की 3 से 4 times जोताई कर के
फिर उसे भुरभुरा कर लें ।
जलवायु
आलू की खेती में तापमान
(temperature) का विशेष रूप से योगदान होता है।
आलू की खेती के लिए
ठंडी जलवायु की
अव्यश्कता होती है । फसल
की अधिक पैदावार के लिए
temperature का कम होना जरुरी
होता है । आलू की फसल
की अलग अलग अवस्थाओं में पौधों को
अलग अलग temperature की
अव्यश्कता होती है । आलू के पौधों को
starting में बढ़ने के लिए temperature लगभग
25 डिग्री से. होना चाहिए । उसके बाद
पौधों के उचित विकास के लिए लगभग 18
डिग्री से. temperature
की जरुरत पड़ती है ।
अधिक कंद के उत्पादन के लिए कम से कम 20
डिग्री से. तक का temperature होना
चाहिए । अगर temperature 30
डिग्री से. से अधिक होता है तो कंद का
उत्पादन कम हो सकता है ।
आलू की प्रजातियाँ / Varieties of
Potato
कुफरी चन्द्र मुखी
– ये आलू लगभग 90 days में तैयार
होती है ।
कुफरी अलंकार – ये आलू
लगभग 70 days में तैयार
होती है ।
कुफरी शीत मान –
इसे तैयार होने में लगभग 100 -120
days लग जाता है ।
कुफरी सिंदूरी – ये
आलू लगभग 140 days में तैयार
होती है ।
कुफरी लालिमा – यह आलू
लगभग 90 days में तैयार
होती है ।
इसके अलावा भी आलू के कई
प्रजातियाँ होती है जैसे
की कुफरी नवताल
G 2524, कुफरी बहार 3792
E, कुफरी स्वर्ण,
कुफरी जवाहर,
कुफरी संतुलज,
कुफरी अशोक आदि ।
बीज का चुनाव व बुआई का समय /
Selection of Potato Seeds and Timing
फसल की अच्छी पैदावार के
लिए स्वच्छ बीज का उपयोग करना
चाहिए । 25 gram से 100 gram तक के वजन
के कंद को बीज के रूप में उपयोग किये
जा सकते है । ज्यादा profit के लिए 3 cm से
3.5 cm आकार के आलूओं को हीं
बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए ।
उत्तर और पश्चिम देशो में आलू की
बुआई October के starting में हीं
कर देना चाहिए। इसके अलावा पूर्वी
भारत में October के बिच से January तक आलू
की बुआई की जा
सकती है ।
बीजोपचार व रोपन
आलू की खेती करने में
बीज को उपचारित(treated) कर के
हीं उसकी बुआई
करनी चाहिए। बीजो को
उपचारित करने के लिए 5 liter मट्ठा में 15 gram
हिंग पीस कर अच्छी तरह
से mix कर के उसमे बीजों को उपचारित
कर के उसे कुछ देर तक अच्छे से सुखा कर
हीं बोना चाहिए ।
फसल के अच्छे उपज के लिए बीज
बोने समय पंक्तियों की दूरी
50 cm की और पौधों से पौधों
की दूरी लगभग 25 cm
की होनी चाहिए।
खाद प्रबंधन
आलू की खेती करने से
पहले खेत में लगभग 60 टन सड़ी हुई
गोबर की खाद, 20kg नीम
की खली, और 20 kg
अरंडी की खली
को एक साथ mix कर के भूमि में समान मात्रा में
छिडकाव कर के खेत की अच्छे से
जुताई कर देनी चाहिए और फिर
बीज की बुआई
करनी चाहिए। बीज बोने के
लगभग 30 दिन के बाद 10 liter गौमूत्र में
नीम का काढ़ा mix कर के उसे अच्छे से
फसल के सभी तरफ छिडकाव कर दें।
सिंचाई प्रबंधन
आलू की खेती में
पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत
करनी चाहिए इसके बाद हर लगभग 15
दिन के
interval पर हल्की सिंचाई करते रहना
चाहिए। आलू की सिंचाई करने समय इस
बात का ध्यान रखें की नालियाँ ¾ से
अधिक ना भरनी पाए। जब आलू
की खुदाई करने का समय आ जाये तो
उससे 10 दिन पूर्व सिंचाई करना रोक देना चाहिए।
खरपतवार
आलू की खेती में
मिट्टी चढ़ाने से पहले हीं
खरपतवार की समस्या ज्यादा
होती है। बीज बोने के बाद
निराई गुड़ाई कर के जब उस पर मिट्टी
चढ़ा दिया जाता है तो खरपतवार की
समस्या थोड़ी कम हो जाती
है। अतः खरपतवार निकलने पर time time पर
उसकी निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए ।
कीट व रोग नियंत्रण
चैपा कीट – यह कीट
dark green या dark black color के होते है।
यह कीट शाखाओं से रस चूस
लेती है जिसके वजह से इसके पत्ते
निचे की तरफ मुड़ जाते है। इससे बचाव
के लिए 5 liter मट्ठा में 5 kg नीम
की पत्ती को mix कर के
उसे लगभग 40 दिनों के लिए सड़ने के लिए छोड़ दें।
जब ये मिश्रण पूरी तरह से सड़ जाये
तो उसे 200 liter पानी के साथ mix
कर के उसका छिड़काव करे ।
कुतरा कीट – यह किट आलू के
वनस्पति, शाखाओं और इसके निकलते हुए कंदों को
प्रभावित करती है। इससे बचने के लिए
लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ
की पत्ती mix कर के उसे
कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और फिर इस
मिश्रण को उबाल कर आधा कर लीजिए।
अब इसे पानी में mix कर के इसका
छिडकाव पम्प से कीजिये ।
अगेती अंगमारी रोग – यह
रोग पत्तियों के निचे से start हो कर ऊपर
की तरफ बढ़ता है । इस रोग में
पत्तीयों पर छोटे छोटे गोल आकार के
धब्बे पर जाते है । इस रोग से बचने के लिए
भी लगभग 10 liter गौमूत्र में 2 kg
अकौआ की पत्ती mix कर
के उसे कुछ दिनों तक सड़ा दीजिये और
फिर इस मिश्रण को उबाल कर आधा कर
लीजिए। अब इसे पानी में
mix कर के इसका छिडकाव पम्प से
कीजिये ।
काली रुसी रोग – यह रोग
एक प्रकार के फफूंदी के वजह से
लगता है । इस फफूंदी का आक्रमण
बीज बुआई के बाद हीं शुरु
होता जाता है । इससे बचने के लिए लगभग 10
liter गौमूत्र में 2 kg अकौआ की
पत्ती mix कर के उसे कुछ दिनों तक
सड़ा दीजिये और फिर इस मिश्रण को
उबाल कर आधा कर लीजिए। अब इसे
पानी में mix कर के इसका छिडकाव
पम्प से कीजिये ।
आलू की खुदाई
जब आप खेत की खुदाई कर रहें हो तो
सभी कटे और सड़े हुए कंदों को छांट
कर अलग कर दें । आलू को बोरो मर भरने समय
इस बात कर ध्यान रहे की आलू के
ऊपर से उसके छिलके नहीं उतरने
चाहिए ।
आलू का भंडारण
आलू बहुत जल्द सड़ने लगता है इसलिए इसका
भंडारण अच्छे से करना बहुत हीं
जरुरी होता है । जिस जगह का तापमान
कम होता है उस जगह आलू का भंडारण करना
ज्यादा मुश्किल नहीं होता है। आलू के
भंडारण के लिए temperature लगभग 2.5
डिग्री से. से ज्यादा नही
होनी चाहिए ।
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